पृथ्वी के आंतरिक भाग की बनावट का सबसे मजबूत साक्ष्य भूकम्प विज्ञान है |

भूकम्प विज्ञान की जानकारी के पहले पृथ्वी की आंतरिक संरचना की जानकारी हमें दो प्रमाणों से प्राप्त होती है –

  1. दबाब –( घनत्व , तापमान)
  2. ज्वालामुखी क्रिया

इन दोनों के तहत कुछ जानकारी प्राप्त होती थी |

earth internal parts

  • पृथ्वी की सबसे ऊपरी परत अर्थात क्रस्ट का घनत्व 3.0 ग्राम/घन सेमी है |
  • जबकि पूरी पृथ्वी का घनत्व 5.0 ग्राम/घन सेमी है |
  • जबकि पृथ्वी की अन्तरतम अर्थात कोर का घनत्व 11 ग्राम/घन सेमी है |
  1. दबाब के द्वारा –

कोर का इतना अधिक घनत्व दबाव के चलते है क्योंकि सतह से जैसे-जैसे अन्दर की तरफ अर्थात कोर की तरफ बढ़ते हैं वैसे-वैसे पृथ्वी पर दबाव बढ़ता जाता है | चट्टानों का भार बढ़ता जाता है उसी अनुपात में दबाव बढ़ता जाता है और जैसे जैसे दबाव बढता है वैसे वैसे घनत्व बढता चला जाता है |

एक तथ्य और सामने आया कि कोर का घनत्व इतना अधिक कैसे है तब यह तथ्य निकलकर सामने आया कि कोर स्वयं निकिल और फेरस जैसे पदार्थों का बना है जिसका भार तथा घनत्व काफी ज्यादा है अर्थात कोर का घनत्व 11 है तो केवल दबाव के चलते नही है क्योंकि प्रत्येक चट्टान की एक सीमा होती है कि दबाव कितना भी बढ़ाया जाये लेकिन घनत्व नहीं बढ़ सकता है |

2-ज्वालामुखी की क्रिया द्वारा –

भूकम्प विज्ञान के पहले ज्वालामुखी क्रिया द्वारा भी पृथ्वी की आंतरिक संचरना के विषय में कुछ निष्कर्ष निकाले गये थे | ज्वालामुखी क्रिया के दौरान मैग्मा निकलता है जिसे हम लावा कहते हैं |

जब ज्वालामुखी प्रक्रिया होती है तो धरती फटती है और पृथ्वी के अन्दर से लावा निकलता है जोकि तरल अवस्था में रहता है | तो यह माना गया है कि पृथ्वी के अन्दर कोई न कोई ऐसी परत है जोकि तरल अवस्था में रहती है| परन्तु समस्या यह हुई कि पृथ्वी में नीचे की ओर जाने पर दबाव इतना बढ़ता जाता है कि वह दबाव पृथ्वी के भीतर किसी भी परत को तरल अस्व्था में नहीं रहने देगा अतः यह मान्यता भी आधारहीन हो गयी कि पृथ्वी के भीतर कोई ऐसी परत है जोकि तरल अस्व्था में रहती है| अतः यह निष्कर्ष निकला कि पृथ्वी के आंतरिक भाग की परत ठोस है न कि तरल |

भूकम्प विज्ञान द्वारा-

भूकम्प के दौरान पृथ्वी पर 3 प्रकार की तरंगें उत्पन्न होती हैं-

  1. प्राथमिक (P) तरंगें – ठोस तथा तरल दोनों चट्टानों में चलती हैं |
  2. द्वितीयक (S) तरंगें – केवल ठोस चट्टानों में चलती हैं |
  3. धरातलीय (L) तरंगें -ये सतही तरंग है ये पृथ्वी के अन्दर प्रवेश नहीं करती हैं |

इन तीनों तरंगों में से P-wave और S-wave से पृथ्वी के आंतरिक भाग के विषय में कुछ निश्चित तथ्य निकलकर सामने आते हैं |

अगर पृथ्वी के अन्दर घनत्व अलग-अलग है तो इन तरंगों की भी गति अलग-अलग होती है|

अगर पृथ्वी के भीतर सर्वत्र एक जैसा घनत्व हो तो ये तरंगें सीधा चलती हैं अर्थात घनत्व हर जगह समान है तो तरंगें सीधी चलेंगी तथा पृथ्वी के अन्दर दो ही तरगें P और S जाती हैं तथा L जोकि धरातालिय तरंग है पृथ्वी के भीतर नहीं जाती है |

पृथ्वी के भीतर जाने वाली तरंगें P और S अगर सीधी जा रहीं हैं तो इसका मतलब है कि पृथ्वी के भीतर घनत्व सर्वत्र एक समान है लेकिन ये तरंगें सीधे न जाकर मुड़ जा रहीं हैं तो इसका मतलब है कि पृथ्वी के भीतर अलग-अलग घनत्वों वाली परतें हैं जिससे तरंगें सीधी न जाकर सतह की तरफ मुड जाती हैं | अतः तरंगों के मुड़ने से यह प्रतीत होता है कि पृथ्वी के भीतर मौजूद परतों के घनत्व में अंतर है अर्थात घनत्व एक समान नहीं है|

भूकम्पी तरंगों में से पृथ्वी के आंतरिक बनावट के विषय में जानकारी के स्रोत दो तरंगें हैं P और S | इनमें से S-तरंगें पदार्थ के केवल ठोस माध्यम में चल सकती हैं जबकि P-तरंगें ठोस तथा तरल दोनों चट्टानों से गुजर सकती हैं |

S-तरंगें – S तरंगें पृथ्वी के नीचे केवल 30 किमी तक ही प्रवेश कर पाती हैं | इसके नीचे ये प्रवेश नहीं कर पाती हैं और वक्राकर होकर सतह की तरफ मुड जाती हैं |S तरंगें S wave

इसलिए पृथ्वी के अन्तरतम में अर्थात कोर में S-तरंगें पूर्णतः अनुपस्थित रहती हैं| अर्थात पृथ्वी के कोर में S-तरंगों का आभाव होता है क्योंकि ये केवल ठोस में चलती हैं और 30km की गहराई के बाद यह सतह की और मुड जाती हैं|

P-तरंगें – P-तरंगें पदार्थ के ठोस तथा तरल दोनों अवस्था में संचरण कर सकती हैं तथा 30km की गहराई के बाद भी प्रवेश करती हैं और गति में विचलन के बावजूद भी अन्तरतम अर्थात कोर को पार कर जाती हैं |

P waves P तरंगें
Credit: studyidol

अर्थात इन तरंगों के द्वारा कोर की संरचना की भी जानकारी प्राप्त होती है और इससे यह भी निष्कर्ष निकलता है कि कोर पूरी तरह से ठोस नहीं है बल्कि कुछ तरल अवस्था में भी है |

Note: भूकम्पी तरंगों की गति में अंतर तभी आता है जब माध्यम के घनत्व में अंतर आता है | जब माध्यम का घनत्व कम होता है तो इन तरंगों की गति भी कम होती है लेकिन जब पृथ्वी की किसी परत का घनत्व जायदा होता है तो इसकी गति भी अचानक बढ़ जाती है |

भूकम्पी तरंगों की गति के आधार पर इन तरंगों को 3 वर्गों में बांटा गया है-

  1. P और S
  2. P* और S*
  3. Pg और Sg

अतः इससे यह पता चलता है कि पृथ्वी के भीतर इन तरंगों की गति में तीन जगहों पर अंतर आता है अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं कि पृथ्वी के भीतर 3 अलग-अलग घनत्व वाली परतें पायी जाती हैं |

अतः भूकम्प विज्ञान के साक्ष्यों के आधार पर पता चलता है कि पृथ्वी की आंतरिक संरचना को तीन वृहद मण्डलों में बांटा गया है और पुनः भूकम्पी तरंगों की गति में अंतर के आधार पर इन तीनों वृहद मण्डलों को तीन उपमण्डल में बांटा गया है |पृथ्वी की आंतरिक संरचना (कोर, मेंटल, क्रस्ट)

0-30 km तक क्रस्ट है |

30km – 2900km तक मेन्टल है |

  • 30 km-700km तक ऊपरी मेन्टल है |
  • 700km-2900 km तक निचला मेन्टल है |

2900km – 6371 km तक कोर है|

  • 2900 km-5100km तक ऊपरी कोर है |
  • 5100km-6371 km तक निचला कोर है |

क्रस्ट– 0-30 km तक का भाग क्रस्ट कहलाता है | हमारा पूरा महाद्वीपीय भाग तथा महासागरीय भाग क्रस्ट पर ही स्थित है| दुनिया का सबसे गहरा समुद्री गर्त मेरियाना गर्त है जिसकी गहराई 11 km तक है| जबकि क्रस्ट की गहराई 30 km तक है |

क्रस्ट का विभाजन भी दो भागों में किया गया है-

क्रस्ट के प्रकार
क्रस्ट के प्रकार
  1. महाद्वीपीय क्रस्ट
  2. महासागरीय क्रस्ट

महाद्वीपीय क्रस्ट की मोटाई अधिक है तथा महासागरीय क्रस्ट की मोटाई कम है |

ऊपरी क्रस्ट का घनत्व अपेक्षाकृत कम होता है जबकि निचले क्रस्ट का घनत्व अधिक होता है और इन दोनों क्रस्ट के मध्य अर्थात ऊपरी क्रस्ट और निचले क्रस्ट के मध्य पाये जाने वाले असातत्य क्षेत्र को हम कोनराड असातत्य क्षेत्र कहते हैं |

क्रस्ट में ऑक्सीजन (O), सिलिका (Si), एल्युमीनियम (Al) तथा फेरस (Fe) जैसे पदार्थों की अधिकता है इसलिए

O <—- Si <—Al <—— Fe

इस परत को हम सियाल कहते हैं |

क्रस्ट का घनत्व 3.0 ग्राम / घन सेमी है|

मेन्टल (प्रावार)- क्रस्ट के निचले आधार पर भूकम्पी तरंगों की गति में अचानक से अंतर आ जाता है| इससे यह पता चलता है कि 30 km की गहराई के बाद पृथ्वी में एक ऐसी परत है जिसका घनत्व क्रस्ट से अधिक है| अर्थात क्रस्ट के नीचे एक अपेक्षाकृत अधिक घनत्व वाली परत पायी जाती है जिसे हम मेंटल कहते हैं|

मेंटल का विस्तार 30Km से लेकर 2900 km तक है| क्रस्ट और मेंटल के मध्य भी एक असातत्य क्षेत्र या Discontinue क्षेत्र पाया जाता है जिसे हम मोहो असातत्य क्षेत्र कहते हैं|

घनत्व के अन्तर के आधार पर मेन्टल को भी दो भागों में विभाजित किया गया है|

  1. ऊपरी मेंटल – 30km – 700km तक
  2. निचला मेंटल – 700km – 2900km तक

मेंटल में सामान्यतः सिलिका (Si) और मैग्नीशियम (Mg) जैसे खनिजों की अधिकता है| इसी कारण प्रवार या मेन्टल को हम सीमा (Sima) भी कहते हैं|

मेन्टल में पृथ्वी का सर्वाधिक द्रव्यमान और भार पाया जाता है|

कोर – कोर पृथ्वी का अन्तरतम भाग है जोकि 2900 km की गहराई से लेकर पृथ्वी के केंद्र तक अर्थात 6371 km तक है |

मेन्टल और कोर के मध्य पाए जाने वाले असातत्य क्षेत्र को गुटेनबर्ग असंबद्धता जोन कहा जाता है|  जहाँ इस सीमा के ऊपर निचले मेंटल का घनत्व 5.6 ग्राम/घन सेमी है | वहीँ इसके नीचे वाह्य कोर का घनत्व 11 हो जाता है|

घनत्व में अंतर के आधार पर कोर को भी दो भागों में बांटा गया है|

  1. बाह्य कोर – 2900km – 5100 km तक
  2. आंतरिक कोर – 5100km – 6371 km तक

बाह्य कोर और आंतरिक कोर के मध्य पाए जाने वाले असात्तय क्षेत्र को लेहमैन असम्बद्धता कहते हैं|

कोर में भारी पदार्थों जैसे निकिल (Ni) और फेरस (Fe) की अधिकता है| इसे हम नीफे भी कहते हैं | अतः इन दोनों खनिजों का घनत्व और भार काफी जायदा होता है|

पृथ्वी के सतह से केंद्र की तरफ जाने पर घनत्व, दबाव तथा तापमान तीनों बढ़ता जाता है|

पृथ्वी के केंद्र का तापमान 5500⁰C है|

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